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Sunday, March 24, 2019

संदेश - महाप्रबंधक

                                                                     

एमएमटीसी लिमिटेड/ MMTC LIMITED
क्षेत्रीय कार्यालय, चेन्नै/ RO, CHENNAI
चेन्नै हाउस, नं. 6, एस्पलानेड, चेन्नै – 600108
CHENNAI HOUSE, NO. 6, ESPLANADE, CHENNAI- 600108.


प. रामचंद्रन                                      
महाप्रबंधक, एमएमटीसी लिमिटेड,
चेन्नै – 600108.




दिनांक 25.03.2019

संदेश

एमएमटीसी लिमिटेड, क्षे.का. – चेन्नै की हिंदी ई-पत्रिका एमएमटीसी किरण का प्रवेशांक प्रकाशित करते हुए मुझे अत्यंत खुशी हो रही है। तकनीक आज के समय की जरूरत है। मुझे पूरा विश्वास है कि तकनीक के पहिया पर चढ़कर राजभाषा हिंदी आगे बढ़ती रहेगी। इसी सोच के तहत इस हिंदी ई-पत्रिका की शुरूआत की गई है।
     मैं कामना करता हूँ कि यह पत्रिका कार्यालय में कार्यरत सभी कर्मचारियों के हिंदी में काम करने के आत्मविश्वास को बढ़ाएगी और उनकी साहित्यिक ज्ञान, विज्ञान को भी समृद्ध करेगी।
    मैं पत्रिका के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।
            शुभकामनाओं सहित
(प. रामचंद्रन)
महाप्रबंधक



संदेश : श्राी रामपाल- महाप्रबंधक (राजभाषा)



एमएमटीसी लिमिटेड

कारपोरेट कार्यालय, दिल्ली,
स्कॉप कांप्लेक्स, लोदी रोड,
दिल्ली – 110003.
 

श्री रामपाल
महाप्रबंधक (हिंदी)
 कारपोरेट कार्यालय, दिल्ली,
 स्कॉप कांप्लेक्स, लोदी रोड,
दिल्ली – 110003.

दिनांक – 25.03.2019.

संदेश
पिछले कुछ वर्षों में एमएमटीसी मे हिन्दी कार्यान्वयन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वर्ष 2016-17 के लिए 09 जनवरी 2019 को आयोजित हिन्दी सलाहकार समिति की बैठक में एमएमटीसी को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। कंपनी के लिय यह पुरस्कार माननीय उद्योग एवं वित्त राज्य  मंत्री श्री सी आर चौधरी  के कर कमलों से हमारे अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री वेद प्रकाश जी ने ग्रहण किया।
यह प्रगति कंपनी के आप सभी कर्मचारियों के सहयोग से ही संभव हो पायी है। राजभाषा प्रभाग इसके लिए आपसभी का आभारी है। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए हमारे चेन्नई कार्यालय द्वारा हिन्दी की ई-पत्रिका एमएमटीसी किरण का प्रकाशन किया जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों में हिन्दी के पठन-लेखन के लि और अधिक रुचि पैदा करना है । पत्रिका मे संकलित हिन्दी साहित्य की विधाओं  जैसे कि कहानी, कविता, लेख, निबंध इसे निश्चय ही पठनीय व रोचक बनाते हैं।
पत्रिका की सफलता के लिए मेरी शुभ कामनाएँ
(राम पाल)
महाप्रबंधक (राजभाषा)

संपादकीय - डॉ. सौरभ कुमार


एमएमटीसी लिमिटेड/ MMTC LIMITED
क्षेत्रीय कार्यालय, चेन्नै/ RO, CHENNAI
चेन्नै हाउस, नं. 6, एस्पलानेड, चेन्नै – 600108
CHENNAI HOUSE, NO. 6, ESPLANADE, CHENNAI- 600108.
 


डॉ. सौरभ कुमार                                      
उप प्रबंधक,
राजभाषा
एमएमटीसी लिमिटेड,
चेन्नै – 600108.




दिनांक 25.03.2019

संपादकीय

 राजभाषा हिंदी, तकनीक और इसके लोकल से ग्लोबल की यात्रा :

हिंदी आज राष्ट्रीय सीमाओं को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय दरवाजे पर दस्तक दे रही है। इसमें ई-माध्यमों का बड़ा योगदान है। यह सहज उपलब्ध और आकर्षण से लैस होता है। इसलिए ई-माध्यमों ने भाषाओं विशेषकर हिंदी भाषा को सीखना-सिखाना आसान बना दिया है। ई-माध्यमों के इन्हीं लाभों के मद्देनजर एमएमटीसी, क्षे.का., चेन्नै ने हिंदी ई-पत्रिका एमएमटीसी किरणकी शुरूआत की है।
        यह पत्रिका न केवल कार्मिकों को राजभाषा प्रयोग में सहज करेगी, बल्कि तकनीकों जैसे कि कंप्यूटर, मोबाईल, वेबसाइट्स और विभिन्न एप्प आदि में हिंदी के अनुप्रयोगों से परिचित कराएगी। इंटरनेट पर हिंदी के कई वेबसाइट्स उपलब्ध हैं। ये वेबसाइट्स राजभाषा, साहित्य, खेल-कूद, मनोरंजन, आर्थिक, राजनीतिक आदि सभी क्षेत्रों से हैं। इस पत्रिका के प्रयोग के द्वारा कार्मिक इनके प्रयोगों के प्रति आकर्षित और सहज होंगे।
          साथ ही हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति से परिचित होते हुए, इसमें शामिल होंगे। मॉरिशस में स्थापित विश्व हिंदी सचिवालय के अनुसार भारत सहित दुनिया के सैकड़ों विश्वविद्यालयों का अध्ययन-अध्यापन किया जाता है। इसके अलावा इन देशों में कार्य कर रहे कई संस्थाएँ राजभाषा हिंदी सीखने के नवाचारों पर गहराई से काम कर रहे हैं। इसमें ई-माध्यम आगे है। हाल में गूगल के सीईओ श्री सुन्दर पिचाई द्वारा शुरू किया गया एप्प “BOLO” इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
      आप सभी पाठक  प्रस्तुत पत्रिका एमएमटीसी किरण के आलेखों में राजभाषा हिंदी के इस लोकल से ग्लोबल की यात्रा को महसूस कर पायेंगे। इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवश्य अवगत कराएँ।

                                                                                                    (सौरभ कुमार)
                                                                                           उप प्रबंधक (राजभाषा)

राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन और प्रसार में कार्यालय प्रमुख का दायित्व : प. रामचंद्रन


राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन और प्रसार में कार्यालय प्रमुख का दायित्व

देश की एकता के लिए राजभाषा हिंदी का कार्यान्वयन और प्रसार आवश्यक समझा गया है। भाषिक विविधताओं से भरे इस देश में एक सामान्य भाषा की दरकार रही है, जो विभिन्न राज्यों के लोगों को जोड़ने का काम करे। हिंदी भाषा की व्यापकता, सरलता और समृद्धि के मद्देनजर हिंदी को इसके लिए उपयुक्त समझा गया और इसे संघ की राजभाषा का दर्जा दिया गया। तत्पश्चात् केन्द्र सरकार के अंतर्गत अथवा अधीन काम करनेवाले कर्मचारियों के लिए राजभाषा हिंदी में कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया। जाहिर है, केन्द्र सरकार के कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे राजभाषा में कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त करके कार्यालय में अधिक से अधिक काम  राजभाषा हिंदी में करें और कार्यालय से बाहर अपने आसपास भी लोगों को हिंदी सीखने, बोलने के लिए प्रेरित करें। इस प्रकार देशभर में हिंदी को बढ़ावा देने में केन्द्र सरकार के कर्मचारियों से विशेष उम्मीद की जाती है।

      केन्द्र सरकार के कार्यालयों के राजभाषा प्रभाग की जिम्मेदारी है कि वह कार्यालय के कर्मचारियों के हिंदी प्रशिक्षण सुनिश्चित करे। साथ ही हिंदी में कर्मचारियों की कुशलता के लिए गतिविधियाँ आयोजित करते रहे। राजभाषा प्रभाग के कार्यों की देख-रेख, मूल्यांकन, समीक्षा और भावी कार्यों के प्रभावी निष्पादन का दायित्व कार्यालय प्रमुख को सौंपा गया है। इसीलिए संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिश पर आदेश जारी करके निदेश दिया गया है कि नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठकों में कार्यालय प्रमुख को स्वयं उपस्थित होना है। साथ ही संसदीय राजभाषा समिति की निरीक्षण प्रश्नावली में प्रस्तुत कार्यालयीन आंकड़ों का प्राधिकृत हस्ताक्षरी कार्यालय प्रमुख ही होते हैं। स्पष्ट है कि राजभाषा हिंदी की उत्तरोत्तर प्रगति और प्रसार के लिए कार्यालय के बाहर और अंदर अंततः कार्यालय प्रमुख का ही उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया गया है। 
 
   दरअसल कार्यालय प्रमुख सभी प्रभागों/अनुभागों/विभागों के प्रमुख होते हैं, साथ ही वह कार्यालय के वरिष्ठतम अधिकारी होते हैं। वरिष्ठतम अधिकारियों से कर्मचारियों को प्रेरणा मिलती है। यदि वरिष्ठतम अधिकारी हिंदी में काम करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, तो कर्मचारी स्वतः स्फूर्त होकर हिंदी में काम करने लगते हैं। यह देखा गया है कि जिन कार्यालयों के कार्यालय-प्रमुख राजभाषा हिंदी के प्रति रूचि रखते हैं और अपने दायित्वों को समझते हैं, उन कार्यालयों में राजभाषा हिंदी की स्थिति संतोषजनक है। इन कार्यालयों के कार्मिक हिंदी में सहजता से काम करते हैं और इनके कार्मिक न सिर्फ कार्यालय के अंदर की राजभाषा गतिविधियों में बल्कि नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति की गतिविधियों सहित कार्यालय के बाहर होनेवाली अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी करते हुए पुरस्कार प्राप्त करते हैं।     

    इसके विपरित जिन कार्यालयों में वरिष्ठतम अधिकारी हिंदी में रूचि नहीं लेते हुए राजभाषा के प्रति अपने दायित्वों की परवाह नहीं करते हैं, वहाँ राजभाषा हिंदी का मुकम्मल कार्यान्वयन नहीं हो पाता है। इन कार्यालयों में कई बार ऐसा भी होता है कि यदि कोई कर्मचारी हिंदी में पत्र, टिप्पणी या मसौदा लेखन करता है तो उसे वरिष्ठ या वरिष्ठतम अधिकारी बुलाकर पूछते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया? यदि कर्मचारी के उत्तर से वे संतुष्ट हो जाते हैं तब तो ठीक है अन्यथा उसे दुबारा उसका अंग्रेजी अनुवाद कर प्रस्तुत करना होता है। इस प्रकार के व्यवहार से हिंदी के प्रति रूचि रखनेवाला कर्मचारी भी हतोत्साहित होता है और इससे बचने के लिए  कर्मचारी फिर हिंदी के बजाय अंग्रेजी में ही लिखता है।

    वरिष्ठतम अधिकारी या किसी भी कार्मिक का राजभाषा के प्रति ऐसा व्यवहार न केवल अशोभनीय है, बल्कि वैधानिक रूप से उचित नहीं है। राजभाषा नियम के अनुसार यदि कोई  कर्मचारी किसी फाईल पर टिप्पण या कार्यवृत्त हिंदी में लिखता है, तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह उसका अनुवाद अंग्रेजी में प्रस्तुत करे। यहाँ कार्यालय प्रमुख का दायित्व है कि वह विभिन्न बैठकों के माध्यम से राजभाषा के इन बुनियादी नीति-नियमों के प्रति अन्य वरिष्ठ अधिकारियों, कार्मिकों को सजग करते रहे।

   कार्यालय में राजभाषा के मुकम्मल कार्यान्वयन के लिए राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के द्वारा कार्यालय में राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित करने का निर्देश है। कार्यालय प्रमुख इसके अध्यक्ष होते हैं तथा विभिन्न प्रभागों के प्रमुख इसके सदस्य होते हैं और राजभाषा प्रभाग के प्रभारी इसके सदस्य-सचिव होते हैं। तीन महीने में एक बार इस समिति की बैठक अनिवार्य है। इस बैठक में राजभाषा के कार्यों की समीक्षा की जाती है और भावी कार्यों की रूपरेखा खीची जाती है। अध्यक्ष होने के नाते कार्यालय प्रमुख का दायित्व है कि इस समिति की नियमित बैठक सुनिश्चित करें। इस बैठक में जहाँ राजभाषा के नीति-नियमों से प्रभाग/अनुभाग प्रमुखों को अवगत करते हुए अपने-अपने प्रभागों/अनुभागों में इन्हें सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाएं वहीं  राजभाषा वार्षिक कार्यक्रम में निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति पर विचार किए जाएं। 

    वास्तव में राजभाषा का कार्यान्वयन प्रेरणा, प्रोत्साहन और सद्भावना के आधार स्तंभ पर टिका है। हिंदी में कार्य करने के लिए कर्मचारियों को समय-समय पर निरंतर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इसके लिए कार्यालय प्रमुख को कार्यालय में लागू प्रोत्साहन योजनाओं का समय-समय पर जायजा लेकर कार्मिकों को इसके लाभ उठाने के लिए प्रेरित करने चाहिए।  कार्यालय प्रमुख को स्वयं प्रोत्साहन योजनाओं से जुड़ना चाहिए ताकि उनके अधीन काम करनेवाले कर्मचारी इसके लिए प्रेरित हो सकें। कर्मचारियों के आंतरिक मूल्यांकन में राजभाषा संबंधी कार्यों को भी महत्ता दी जाए। इससे कर्मचारियों का राजभाषा के प्रति झुकाव अधिक होगा और वे राजभाषा में दक्षता प्राप्त करने के लिए स्वत: प्रयास करेंगे।

    राजभाषा हिंदी में काम करने में हिचकिचाहट दूर करने के लिए कार्यालय में समय-समय पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं तथा कार्मिकों को विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण दिए जाते हैं। कार्यशालाओं या प्रशिक्षणों के विषय कर्मचारियों की आवश्यकतानुसार रखे जाएँ। कार्यशाला या प्रशिक्षण में शामिल कर्मचारी पढ़ाए गए विषयों को अपने दैनिक कामकाज में उतार रहे हैं या नहीं, इसका भी ध्यान रखने की नितांत आवश्यकता है। इसके अभाव में कार्यशाला या प्रशिक्षण का विशेष लाभ नहीं है। कार्यालय प्रमुख सभी प्रभाग प्रमुखों को सीधा निर्देश दें कि कार्यशाला या प्रशिक्षण में भाग लिये कर्मचारियों के टिप्पण, पत्र, मसौदा, प्रविष्टि, टंकण आदि में यह अवश्य देखें कि वह राजभाषा हिंदी की कार्यशाला, प्रशिक्षण में सीखे गये विषयों को अपने कामकाज में प्रयोग कर रहे हैं, अथवा नहीं। और उन्हें प्रयोग करने के लिए प्रेरित करें।

    कार्यशाला, प्रशिक्षण, बैठक के अलावा राजभाषा को बढ़ावा देने के लिए कवि सम्मेलन, कहानी पाठ, गीत-गायन, नाटक, हिंदी पखवाड़ा आदि कई गतिविधियाँ आयोजित करने की आवश्यकता होती हैं। राजभाषा हिंदी प्रसार की इन गतिविधियों को सांस्कृतिक कार्यक्रम की तरह देखा जाए, जो कि दैनिक कार्यों के बीच रिफ्रेश होने के लिए की जाती हैं। इन गतिविधियों को कड़ी प्रतियोगिता की तरह न आयोजित करके मनोरंजन के पुट के साथ तैयार की जाए, जिसका उद्देश्य सीखना हो। इससे कार्मिक सहजता से अधिक से अधिक संख्या में जुड़ सकेंगे।

     प्रायः राजभाषा हिंदी से संबंधित रिपोर्ट्स को गंभीरता के साथ नहीं देखी जाती हैं। इसे खाना-पूर्ति समझा जाता है। जबकि राजभाषा से संबंधित रिपोर्ट्स बेहद महत्वपूर्ण हैं। ये रिपोर्ट्स समेकित होकर विभिन्न चरणों से गुजरते अंततः राजभाषा संसदीय समिति के पास जाती हैं। राजभाषा संसदीय समिति के सदस्यों के द्वारा नामित सदस्य इसे संसद के सदनों में रखते हैं। अतएव कार्यालय प्रमुख को राजभाषा रिपोर्ट्स को खाना-पूर्ति समझने के बजाए इसकी पूरी जानकारी प्राप्त करते हुए स्वीकृति प्रदान करने की आवश्यकता है।

    जाहिर है कि राजभाषा प्रभाग का दायित्व व्यापक है। यह संवैधानिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है। इसके मुकम्मल अनुपालन के लिए राजभाषा प्रभाग में उचित संख्या में कार्मिकों का होना अतिआवश्यक है। कई सरकारी कार्यालयों में राजभाषा प्रभाग में कम संख्या में कार्मिक होते ही हैं, साथ में राजभाषा अधिकारी को अन्य कार्य सौप दिए जाते हैं, जिससे राजभाषा अधिकारी अन्य कार्यों में ही उलझे रहते हैं और राजभाषा कार्यान्वयन का काम न के बराबर हो पाता है। कार्यालय प्रमुख ध्यान रखें कि राजभाषा प्रभाग में कर्मचारियों की संख्या का अनुपात उचित हो।

   राजभाषा का काम एक अभियान है, जिसका उद्देश्य राष्ट्र की एकता, संस्कृति, विकास और गौरव से जुड़ा है। इतने बड़े उद्देश्य के साथ काम करने के लिए बहुत लगन, परिश्रम और धैर्य की आवश्यकता होती है, जिसे समझना चाहिए और उसके अनुसार राजभाषा प्रभाग में काम कर रहे कार्मिकों को प्रोत्साहित करने चाहिए। प्रायः अधिकांश कार्यालयों में राजभाषा प्रभाग को उपेक्षित किया जाता है। कार्यालय के कुछ कार्मिक तो राजभाषा प्रभाग और इसके कार्मिकों को अतिरिक्त भार समझते हैं। कार्यालय की अन्य उपलब्धियों को जहाँ विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान उल्लेख किया जाता है, वहीं राजभाषा प्रभाग की उपलब्धियों का नाम तक नहीं लिया जाता है। राजभाषा प्रभाग की सुध तभी ली जाती है, जब संसदीय राजभाषा समिति या किसी अन्य समिति द्वारा निरीक्षण के पत्र प्राप्त होते हैं। ऐसी स्थिति में राजभाषा प्रभाग में कार्य कर रहे कर्मचारियों का उत्साह गिरा हुआ रहता है। राजभाषा प्रभाग और इसमें काम कर रहे कर्मचारियों को उनके काम के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है और कार्यालय प्रमुख द्वारा कार्यालय के सार्वजनिक मंचों से अन्य प्रभागों की उपलब्धियों की तरह इनकी उपलब्धियों का भी उल्लेख करने से राजभाषा प्रभाग का हौसला बुलंद रहेगा और राजभाषा प्रभाग महान देश को एकसूत्र में पिरोने में अपना योगदान उत्साह और उमंग के साथ देता रहेगा।
-    प. रामचंद्रन
महाप्रबंधक
एमएमटीसी लिमिटेड, चेन्नै

बाल विवाह : एक सामाजिक समस्या - प्रेमा रामकुमार

बाल विवाह : एक सामाजिक समस्या

भारतीय समाज संस्कारों का समाज है। जैसे-जैसे हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे कामयाबी के साथ चुनौतियाँ हमारे समक्ष बड़ी से बड़ी खड़ी होती जा रही हैं। कुछ समय पहले बाल विवाह की अनिवार्यता रही होगी, लेकिन आज के समय में बाल विवाह लड़कियों के लिए जंजीर की तरह है। लड़कियों को बाल विवाह के बंधन में बांध देना अनुचित ही नहीं, गैर कानूनी भी है। 
               विकास के इस युग में हर वर्ष बड़ी संख्या में वाल विवाह होने की सूचना मिलती है। यह अभिशाप केवल ग्रामीण समाज में नहीं, शहरी समाज में भी कमोबेश है। बाल विवाह का सबसे बड़ा दोष अशिक्षा है। इस दिशा में अशिक्षा के साथ संकीर्ण सोच भी अपना काम करती है। भारतीय ग्रामीण समाज आर्थिक संकटों से घिरे रहने के कारण वह कम उम्र में बिटिया का ब्याह कर जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहता है। लेकिन शहरी समाज के पास सभी तरह की सुविधाओं के स्रोत होने के बावजूद वहाँ भी बालविवाह की घटनाएँ कमोबेश घटती रहती हैं। लोगों के मन में यह धारणा है कि ब्याह के पहले लड़कियाँ असुरक्षित रहती हैं और ब्याह हो जाने से असमाजिक तत्वों से वह सुरक्षित रहती है। अब यह बात कौन समझाए कि भारत में महिलाओं के साथ बलात्कार के जो आंकड़े आते हैं, उनमें ब्याहता औरतों की संख्या बड़ी होती है।

लोगों में जागरूकता का अभाव ही बाल विवाह की सबसे बड़ी चुनौती है। समाज को कम उम्र में बच्चों की शादी के दुष्परिणाम से अवगत कराने की जरूरत है। इसके  लिए समाज के प्रबुद्ध लोगों को आगे आना चाहिए, क्योंकि बाल विवाह बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए बाधक है।

               बाल विवाह सिर्फ़ भारत में ही नहीं संपूर्ण विश्व में होते आये हैं और पूरे विश्व में भारत का बाल विवाह में दूसरा स्थान है। भारत में सबसे अधिक साक्षरतावाले केरल राज्य में अब भी बाल विवाह प्रचलित है। सरकार के द्वारा विवाह के लिए भारत में लड़की की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की आयु 21 वर्ष निश्चित की गई है। इसका मनोवैज्ञानिक आधार यह है कि इस उम्र तक आते-आते क्रमश: लड़के-लड़की दुनियावी जिम्मेदारियों से परिचित हो जाते हैं। साथ ही वे मानसिक और शारीरिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं। यदि इस आयु को प्राप्त करने  के पहले विवाह करा दिया जाता है तो इसे बाल विवाह माना जाएगा।

बाल विवाह के कारण :
1 अशिक्षा
2 गरीबी
3 अंधविश्र्वास
4 लड़की की शादी को माँ-बाप द्वारा अपने ऊपर एक बोझ समझना
5 लड़कियों को आर्थिक बोझ समझना
6 सामाजिक प्रथाएँ एवं परंपराएँ

बाल विवाह के दुष्परिणाम :

कम उम्र में शादी होने पर बालक व बालिका की पढ़ाई बंद हो जाती है। लड़की के अशिक्षित होने के दुष्परिणाम पूरे परिवार पर पड़ता है। वह अपने बच्चे की प्रथम गुरू होने की भूमिका में भी विफल रहती है। अशिक्षित बालक अपने परिवार का पालन-पोषण अच्छी तरह से करने में असमर्थ रहता है। बाल विवाह होने के कारण लड़कियों के व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक खेल-कूद एवं विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के अवसर बंद हो जाते हैं। यह स्थिति परिवार, समाज और देश विकास में भी बाधक है। लड़का भी कम उम्र में विवाह होने पर उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता है और उसके व्यक्तित्व का विकास भी बंद हो जाता है।

बाल विवाह को रोकने के लिए कानून :

बाल विवाह एक सामाजिक बुराई के साथ कानूनी अपराध भी है। भारतीय संविधान विभिन्न  कानूनों और अधिनियमों के माध्यम से बाल विवाह रोकने का प्रबंध करता है। बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 भारत का एक अधिनियम है जो 1 नवंबर 2007 से लागू हुआ। इसके अनुसार बाल विवाह वह है, जिसमें विवाह के समय लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम या लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम हो। ऐसे विवाह को बाल विवाह निषेध अधिनियम द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। यदि वे अपने उम्र से कम है, शादी करने जा रहे हैं तो इसके लिए 15 दिन का कारावास और एक हज़ार रुपए जुर्माने का प्रावधान है। केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की यह गंभीर समस्या है। इसकी रोकथाम के लिए यूनिसेफ को इस दिशा में सख्त कदम उठाने की जरूरत है। हमें जन-जन तक यह बात पहुँचानी होगी कि बाल विवाह एक कानूनी अपराध है। यदि बाल विवाह किया गया, तो निश्चित रूप से बाल विवाह करने वाले, करवाने वाले और मदद करने वाले कानून की नज़रों से नहीं बचेंगे और निश्चित रूप से दंडित होंगे। बाल विवाह रोकने के लिए हमारे देश में कानून मौजूद है, लेकिन कानून के सहारे इसे रोका नहीं जा सकता। बाल विवाह एक सामाजिक समस्या है। इसका निदान सामाजिक जागरूकता से ही संभव है। समाज में रहने वाले लोगों को आगे आना होगा तथा लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। साथ ही साथ आज के युवा वर्ग को बाल विवाह के विरूद्ध आवाज़ उठाना होगा तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओअभियान से जुड़कर समाज को इस सामाजिक कुप्रथा को खत्म करने के लिए जागरूक करना होगा। जब तक बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियाँ हमारे समाज में हैं तब तक हमारे देश का विकास पूर्ण रूप से नहीं हो सकता है। 
- प्रेमा रामकुमार
मुख्य कार्यालय प्रवंधक (नि.स)
                                                          क्षेत्रीय कार्यालय, चेन्नै

लोक कथा : बाजार - गोपीनाथ


बाजार


ब्रिटेन की एक जूता बनाने वाली कंपनी बहुत पहले अफ्रीका महादेश में अपना बाजार पता लगाने के लिए अपने दो मार्केटिंग मैनेजर  '' औक '' को भेजा।
दोनों मार्केटिंग मैनेजरों ने अफ्रीका महादेश में घूम-घूमकर जूते के व्यापार की संभावना के बारे में विस्तार से अध्ययन किया और दोनों ने कंपनी के अध्यक्ष को अपनी-अपनी रिपोर्ट पेश की।
मार्केटिंग मैनेजर '' - 'अफ्रीका में जूते के व्यापार की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि वहाँ के लोग जूते पहनते ही नहीं हैं इसलिए जूते  के बारे उन्हें कोई जानकारी नहीं है।
मार्केटिंग मैनेजर '' - 'अफ्रीका में जूते के व्यापार की बहुत अधिक संभावना है। पहले उन्हें जूते की उपयोगिता, गुण और इसके लाभ बताने की जरूरत है।'
प्रस्तुतकर्ता – गोपीनाथ
वरिष्ठ प्रबंधक
एमएमटीसी लिमिटेड, चेन्नै


लोक कथा : बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की मूर्ति : प्रस्तुतकर्ता - प्रदीप कुमार चौरसिया

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की मूर्ति



मुरली  स्कूल आते-जाते  मोड़ पर बने  बाबासाहेब  आंबेडकर की  मूर्ति (Statue) को गौर से देखा करता था।
घर आने पर एक दिन अपने अप्पा से पूछा .....
मुरली - अप्पा, बाबासाहेब के जेब में हमेशा पेन क्यों रहता है?
अप्पा - बहुत अच्छा प्रश्न है, मगने। वो चाहते थे कि सभी  पढ़ें-लिखें। 
            पढ़ाई से हम नई-नई बातें सीखते हैं, जो हमें आगे ले जाती हैं। 
            पेन हमें लिखना-पढ़ना सीखाता है। अपनी बात कहना सीखाता है।
             इसीलिए बाबा साहेब चाहते थे कि सभी के हाथों में पेन हो। 
             उसी पेन से बाबासाहेब ने संविधान लिखा। 
मुरली - अप्पा, मैं भी अपनी जेब में पेन रखूँगा।
            अप्पा, एक प्रश्न और पूछना चाहता हूँ। 
अप्पा - पूछो मगने।
मुरली -  उनके हाथ में कौन-सी किताब है?
अप्पा - बहुत अच्छ प्रश्न है मगने। 
           उनके हाथ में जो किताब है, उसका नाम है - 'भारतीय संविधान (Indian Constitution)' 
            यह संविधान हमें मिलजुलकर (Together) रहना सीखाता है। 
             यह सभी का सम्मान (respect) करने की बात करता है। 
             यह आदमी-आदमी में बराबरी (equality) की बात करता है।
मुरली - अप्पा, एक आखिरी प्रश्न।
अप्पा  - पूछो, मगने।
मुरली - बाबासाहेब, अपनी उंगली क्यों उठाये हुए हैं?
अप्पा - बहुत अच्छा प्रश्न है, मगने। 
             वह उंगली उठाते हुए लोगों से कहते हैं कि हमें ऊँचा उठना चाहिए।
              हम पढ़-लिखकर ऊँचा उठ सकते हैं। ऊँचा उठने के लिए हमें संघर्ष (struggle) करना चाहिए। 
              संघर्ष करके हमें अपने अधिकारों (rights) को प्राप्त करना चाहिए। 
              साथ ही अपने कर्तव्यों (duties) को भी ईमानदारी (Honesty) से निभाना चाहिए। 
 मुरली - जरूर अप्पा, मैं खूब पढ़ूँगा, लिखूँगा और अपना काम ईमानदारी से करूँगा।
अप्पा - जरूर मगने। तुम पर हमें विश्वास है।
प्रस्तुतकर्ता – प्रदीप कुमार चौरसिया
उप प्रबंधक (वित्त व लेखा)
                                                एमएमटीसी लिमिटेड, चेन्नै