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Monday, September 23, 2019

दैनिक जीवन में योग का महत्व


दैनिक  जीवन  में योग  का महत्व

“ दैनिक  जीवन में  योगएक पद्धति का परिचय  –शरीर, बुद्धि, चेतना एवं आत्मा का विज्ञान  आज  की  दुनिया में दिन प्रतिदिन  बढ़  रहा है।
हर  मानव की  इच्छा  स्वयं  और  पर्यावरण  से समरस होकर जीवित रहने की है।  तथापि आधुनिक युग में अधिक शारीरिक और भावात्मक इच्छायें लगातार जीवन के अनेक क्षेत्रों पर भारी हो रही है।  परिणामतः अधिकाधिक व्यक्ति  खिंचाव, चिंता, अनिद्रा जैसे शारीरिक और मानसिक तनावों से पीड़ित हैं और शारीरिक सक्रियता और उचित व्यायाम में एक असंतुलन सा बन गया है।
“ दैनिक जीवन में योग पद्धतिविश्वव्यापी योग केन्द्रों,प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों,स्वास्थ्य संस्थाओं,दक्षता और खेलकूद, पुनर्स्थापन  केन्द्रों  और स्वास्थ्य विहारों में सिखाई जाती है।  यह अयोग्य,विकलांग, बीमार और स्वास्थ्य लाभ करने वाले सभी व्यक्तियों को योगाभ्यास करने की संभावना प्रदान करती है।  इसका नाम स्वयं इस बात का द्योतक है कि योग का प्रयोग दैनिक जीवन में  किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए।
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दैनिक जीवन  में योग  के  मुख्य लक्ष्य हैः-
1.    शारीरिक स्वास्थ्य
 
2. मानसिक स्वास्थ्य
3. सामाजिक स्वास्थ्य
4. आध्यात्मिक स्वास्थ्य
5. आत्मानुभूति या हमारे अपने अंदर दिव्यात्मा की अनुभूति
इन लक्ष्यों की प्राप्ति निम्नलिखित द्वारा होती हैः-
*  सभी जीवधारियों के प्रति प्रे और सहायता - भाव
*  जीवन के प्रति सम्मान और प्रकृति व पर्यावरण का संरक्षण
*  मानसिक शांति
*  पूर्ण विचार तथा सार्थक और सकारात्मक जीवन शैली
*  शारीरिक, मानासिक और आध्यात्मिक अभ्यास
* सभी शब्दों, संस्कृतियों और धर्मों के प्रति सहानुभूति व                   सहनशीलता
हमारे देश में योग बहुत प्रचलित हो गया है। योग करके हम शरीर की अनेक बीमारियों को दूर कर सकते हैं।  यह बीमारियों को ही नहीं ठीक करता बल्कि अवसाद, चिंता, डिप्रे, मोटापा, मनोविकारों को भी दूर भगाता है।  योग के अनेक लाभ हैं।
विश्व में हर साल “21जून” का दिन “विश्व योग दिवस” के रूप में मनाया जाता है।  वर्ष 2014में संयुक्त राष्ट्र संघ ने “विश्व योग दिवस” मनाने की घोषणा की थी।  योग का अर्थ “बांधना अथवा एकता” है।  यह विश्व के अनेक देशों में प्रचलित हो गया है।
चीन, तिब्बत, जापान के साथ-साथ अमेरिका, यूरोप,ब्रिटेन में भी यह बहुत प्रचलित हो गया है।  वेदों में भी योग का उल्लेख मिलता है।  सिन्धु धाटी सभ्यता से ऐसी अनेक मूर्तियाँ मिली हैंजिसमें योग के चित्र बने हुए हैं। ऋषि पतंजलि योग दर्शन के संस्थापक माने जाते हैं
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योग कोई प्राचीन मिथक नहीं है।  यह
  वर्तमान की सबसे बहुमूल्य विरासत है। 
  यह आज की आवश्यकता है और
  कल की संस्कृति”  --- स्वामी सहजानन्द सरस्वती

योग कई प्रकार के हैं, जैसे :-
1. मंत्रयोग
2. हठयोग
3. कुंडलिनीयोग
4. राजयोग

आज केवैज्ञानिक युग में योग के निम्न 6फायदें हैं :
1. योग का प्रयोग शारीरिक,मानसिक और आध्यत्मिक लाभों के लिए हमेशा होता रहा है। आज की चिकित्सा शोधों ने ये साबित कर दिया है कि योग शारीरिक व मानसिक रूप से मानवजाति के लिए वरदान है।
2. जहां जिम़ अदि से शरीर के किसी खास अंग का ही व्यायाम होता है वहीं योग से शरीर के समस्त अंगो- प्रत्यंगों, ग्रंथियों का व्यायाम होता है।
3. योगाभ्यास से रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है।
4. योग से हम अपना वजनकम कर सकते हैं और दूसरी तरफ योगासन मांसपेशियों को पुष्टता प्रदान करता है जिससे दुबला-पतला व्यक्ति भी ताकतवर हो सकता है।
5. प्राणायाम के लाभ - योग के अंग प्राणायाम एवं ध्यान भी योगासनों की तरह शरीर के लिए बहुत फादेमंद है ।
6. ध्यान भी योग का एक प्रमुख लाभ है।
योग का लाभ :- छात्रों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए योग विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध  होता है।  क्योंकि यह उनके मानासिक स्वास्थ को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है।
आज की आवश्यकता को देखते हुए योग शिक्षा की बेहद महत्वपूर्ण आवश्यकता है क्योंकि सबसे बड़ा सुख शरीर का स्वस्थ होना ही  है।
अतः आज  की भाग-दौड़ की जिन्दगी में खुद को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखने के लिए योग बेहद आवश्यक है।
वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है बल्कि विश्व के बढ़तेप्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण के संदर्भ मे भी इसकी सार्थकता और बढ़ गई है।

-    एस. राजेश्वरी
वरिष्ठ प्रबंधक
एमएमटीसी लिमिटेड
चेन्नै-600 108
मोबाइल : 9677290044







योग और हमारा स्वास्थ



योग न सिर्फ लोगों को बीमार होने से बचाता है|बल्कि वह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर उनमें सकारात्मक ऊर्जा भरने का कार्य भी करता है। आज के मशीनी युग में मानव का जीवन यंत्रवत हो गया है,तथा उनके सारे कार्य मशीनों से सम्पन्न होने लगे हैं। इस तरह के माहौल में स्वयं को शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्रखना एक बड़ी चुनौतीबन गया है। हमारी दिनचर्या का ही परिणाम है कि हमारा जीवन तनाव,बीमारी व आलस का कारण बनता जा रहा है।
भले ही विज्ञान की उन्नति ने हमें वो सभी सुख-सुविधा प्रदान कर दी है,जिससे हमारा जीवन आसानी से व्यतीत हो जाए।
मानव ने मलेरिया, कैंसर जैसे असाध्य बीमारियों के लिए दवाइयों की खोज  करली मगर अभी तक मानसिक शांति के लिए उनके पास भी कोई जवाब नहीं है।
मगर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति ने विश्व के लोगों को न सिर्फ शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के संबंध में युक्तियाँ प्रदान की है, बल्कि मन कीशांति के लिए भी एक ऐसी आशा की किरण प्रदान की है।

वह योग ही है जिसके माध्यम से तनाव, बीमारी, थकान व अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से पूर्णतः छुटकारा पाया जा सकता है।  योग व्यक्ति के मन की शांति प्राप्त करने का सबसे युक्तिसंगत तरीका है।
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योग का इतिहास
1950 के आसपास योग भारतीय उपमहाद्वीप से निकलकर पश्चिम के देशों द्वारा कई बार इसपर वैज्ञानिक शोध व परीक्षण किए गए।  उन शोध के नतीजों ने भारतीय योग शिक्षकों के दावे पर मुहर लगा दी।  आज के युग में योग मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। इस कारण इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।
    योग का शब्दिक अर्थ व परिभाषा
योग शब्द की उत्पति संस्कृत की यज धातु से हुई है,जिसका शाब्दिक अर्थ होता है जोड़ना या संबन्धित करना। यदि योग को परिभाषित किया जाए तो यह उस विधा का नाम है, जिससे शरीर व आत्मा का मिलन अर्थात योग होता है।
भारत में आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व से योग का जन्म माना जाता है।  इसके बारे में पहला प्रामाणिक ग्रंथ पतंजलि द्वारा योगसूत्र 200 ईसा पूर्व लिखा गया था।
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प्राचीन भारत में रही गुरु शिष्य परंपरा के चलते यह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हुई आज भी जीवित है। इस विधा से आज करोड़ों लोग लाभान्वित हो रहे हैं, जिनका श्रेय भारतीय योग गुरुओं जैसे बाबा रामदेव को दिया जाना न्यायसंगत है।
योग के प्रकार
महर्षि पतंजलि द्वारा लिखे गये योगसूत्र में पाँच प्रकार के योग का वर्णन किया गया है, जिनमें हठ योग, कर्म योग, ध्यान योग, भक्ति योग व ज्ञान योग का उल्लेख किया गया है।
ज्ञान का मस्तिष्क से, भक्ति का आत्मा से, ध्यान का मन से तथा कर्म योग का संबंध कार्यों से माना गया है।  साथ ही योग के 8 अंगों का विधान भी किया गया है जो इस प्रकार है।
1.  यम - हिंसा न करना, सत्य बोलना, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य व धन इकट्ठा न करने की शिक्षा।
2.  नियम - स्वयं अध्ययन, संतोषी स्वभाव, तपस्या, शारीरिक व मानसिक पवित्र आचरण तथा आस्था को नियम में रखा गया है।
3.  आसन –योगसूत्र में विभिन्न 84 शारीरिक क्रियाओं को आसन में शामिल किया जाता है ।
4.  प्राणायाम -  श्वास को अंदर लेना, अंदर रोक कर रखना, तथा छोड़ना प्राणायाम मे आता है । 


5.  प्रत्याहार – लौकिक सुख और इच्छाओं को समाप्त कर अपना मन एकाग्रचित्त करना प्रत्याहार कहलता है।
6.  धारणा – किसी श्रेष्ठ कर्म को मन में धारण कर उसकीअभिप्राप्ति हेतु किया जाने वाला प्रयत्न धारणा कहलाता है।
7.  ध्यान – अंतरात्मा के साथ अपने मन को इसतरहकेन्द्रित कर देना जिससे संसार के किसी क्रियाकलाप का उस पर प्रभाव न पड़े।

योग का जीवन मे महत्व
अब तक के विवरण से यह स्पष्ट है कि शरीर को स्वस्थ स्थिति में लाकर ही योग किया जा सकता है तथा किस तरह योग के आठ अंग व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
मन, आत्मा व शरीर इन तीनों अवयवों को एक कर देना, उनमें एक स्थापित कर देना ही योग है।
-    पी. एम. तंगमणि
वरिष्ठ प्रबंधक
एमएमटीसी लिमिटेड, क्षे.का. – चेन्नै।






हिंदी ही भारत की राजभाषा – क्यों?




     हिंदी हमारी न केवल राजभाषा है बल्कि राष्ट्रभाषा भी है। महात्मा गाँधी ने कहाहैअगर हमारे देश का स्वराज्य अंग्रेजी बोलने वाले कुछ भारतीयों का है तो नि:संदेह अंग्रेजी ही राजभाषा होगी। लेकिन स्वतंत्र देश के करोंड़ों आम जनता के लिए है तो हिंदी ही एक मात्र राजभाषा हो सकती है।

     भाषा संप्रेषण का माध्यम है। विचारों का आदान-प्रदान भाषा के द्वारा ही संभव है। हिन्दी वह भाषा है जिसमें सरकार जनता से पत्र-व्यवहार करती है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकार किया गया है और उसी दिन सभी राज्यों को यह अधिकार दिया गया कि वह अपने-अपने राज्य की मुख्य भाषा को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करे। इस प्रकार हिंदी – केंद्र सरकार की राजभाषा बन गई।


हिंदी राजभाषा बनी क्योंकि...........
·        हमारी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक है इसलिए जनता की भाषा में काम करना ज़रूरी है। भारत की जनगणना के अनुसार भारत की अधिकतर जनता द्वारा हिंदी ही बोली और समझी जाती है। लगभग 78% जनता हिंदी में बोल, समझ, पढ़ और लिख सकती है। उत्तर भारत में हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, दिल्लीआदि की रोज़मर्रा भाषा हिंदी ही है। सरकारी आवश्यकताएं और कानून आदि को समझने और समझाने तथा कार्य करने और कराने के लिए हिंदी की आवश्यकता होती है।
·        हिंदी देश के भिन्न-भिन्न भागों को एक सूत्र में बाँधने का काम करती है। हिंदी एक संपर्क भाषा है। हिंदी के द्वारा जनता अपने देश की नीतियों और प्रशासन को अच्छी तरह समझ सकती है।
·        गणतंत्र देश में सरकार और जनता के बीच भाषा की दीवार नहीं होनी चाहिए। शासन का काम जनता की भाषा में होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा में ही स्पष्टता और सरलता से अपने विचारों को प्रकट कर सकता है।
·        भारत में कई भाषाएं बोली जाती हैं जिनमें से 22 भाषाओं को संविधान में राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई है। परंतु, भारत की संविधान सभा के द्वारा राजकाज चलाने तथा केंद्र एवं राज्यों के बीच संपर्क भाषा की भूमिका निभाने का उत्तरदायित्व   हिंदी को ही सौंपा गया क्योंकि यह देश के अधिकांश लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है तथा इसके साथ भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परम्पराएंभी जुड़ी हुई हैं।
·        हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। वह हमारे देश की पुरानी भाषा संस्कृत की अपनी लिपी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार देवनागरी में लिखित हिंदी संघ की राजभाषा है।

·        सरकारी कार्यालयों, उपक्रमों, अधीनस्थ कार्यालयों, मंत्रालयों आदि में पत्र-व्यवहार करने के लिए हिंदी केही उपयोग पर बल दियाजाता है।


गणतंत्र देश में जनता की भाषा को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना किसी भी सरकार का प्रथम कर्तव्य है और उसी से सरकार मज़बू हो सकती है। हिंदीभारत के लगभग सभी प्रांतों में प्रचलित है।

     हिंदी जनसाधारण की भाषा बन गई है। लगभग सौ करोड़ लोगों के बीच में सरल आदान-प्रदान के लिए यदि कोई भाषायी माध्यम है तो वह हिन्दी ही है,सीलिए हिंदी भारत की राजभाषा है।

-    प्रेमा रामकुमार
मुख्य कार्यालय प्रबंधक (नि.स.)
एमएमटीसी लिमिटेड
क्षेत्रीय कार्यालय, चेन्नै








तमिलनाडु से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य


तमिलनाडु से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

तमिलनाडु से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, उस दौरान तमिलनाडू मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था।  आजादी मिलने के बाद मद्रास प्रेसीडेंसी का विभाजन कर दिया गया, जिसकी वजह से मद्रास एवं अन्य राज्यों का उद्भव हुआ था| सन् 1968 के दौरान मद्रास प्रांत का नामकरण तमिलनाडु के रूप में कर दिया गया|
तमिलनाडु का इतिहास
       तमिलनाडु का इतिहास बहुत पुराना है| यद्यपि प्रांरभिक काल के संगम ग्रंथो में इस क्षेत्र का इतिहास का अस्पष्ट उल्लेख मिलता है किन्तु तमिलनाडु का लिखित इतिहास पल्लव राजाओ के समय से ही उपलब्ध है। तमिलनाडु भारत के कुछ स्थानों में से एक है जो प्रागैतिहासिक काल से आज तक आबाद है| प्रारम्भ में यह तीन प्रसिद्ध राजवंशो की कर्मभूमि रही है चेर, चोल और पांड्य। तमिलनाडू के प्राचीन साहित्य में यहाँ के राजाओं, राजकुमारों तथा उनके प्रशंसक कवियों का विवरण मिलता है| विशेषज्ञ मानते हैं कि यह साहित्य ईसा के बाद की कुछ प्रांरभिक सदियों का है|
      तमिलनाडू के उत्तर में स्थित मेरुर ग्राम, जहां से पल्लव और चोल काल के लगभग 200 अभिलेख मिले हैंचोल पहली सदी से लेकर चौथी सदी तक मुख्य अधिपति रहे| इनमें प्रमुख करिकाल चोल का है जिसने अपने साम्राज्य का विस्तार कांचीपुरम तक किया| चौथी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पल्लवों का सूत्रपात हुआ अंतिम पल्लव राजा अपराजित थे, जिनके राज्य में लगभग दसवीं शताब्दी में चोल शासको ने विजयालय और आदित्य के मार्गदर्शन में अपना महत्व बढाया। 11वीं शताब्दी के अंत में तमिलनाडु पर चालुक्य, चोल, पांड्य जैसे अनेक राजवंशो का शासन रहा इसके बाद के 200 वर्षो तक दक्षिण भारत में चोल साम्राज्य का आधिपत्य रहा तमिल का संगम साहित्य चेर, चोल वंश और पांड्य वंशो के शासनकाल में पचाईमलाई पहाड़ियों में फला और फुला हैचोल राजाओं ने वर्तमान तंजावुर जिला और तिरुचिरापल्ली जिले तक अपने राज्य का विस्तार किया। इस काल में चोल राजाओं ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। तीसरी सदी के कालभ्रो के आक्रमण से चोल राजाओं का पतन हो गया। कालभ्रो को छठी सदी तक, उत्तरी भागो में पल्लवों तथा दक्षिण भारत में पांड्यो ने हराकर भगा दिया।
तमिलनाडु की भौगोलिक स्थिति
      तमिलनाडु को धरातलीय दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला पूर्वी तटीय मैदान और दूसरा उपजाऊ उत्तर और पश्चिमी की ऊँची भूमि। पूर्वी मैदान का सबसे चौड़ा हिस्सा उपजाऊ कावेरी के डेल्टा पर है जो आगे दक्षिण में रामनाथपुरम और मदुरै के शुष्क मैदान है। राज्य के समूचे पश्चिमी सीमान्त पर पश्चिमी घाट की ऊँची श्रुंखला फ़ैली हुयी है। पूर्वी घाट की निचली पहाडियों और सीमांत क्षेत्र, जो स्थानीय तौर पर जावड़ी कालरायन और शेवरॉय कहलाते हैं प्रदेश के मध्य भाग की ओर फैले हैं। तमिलनाडु की मुख्य नदियाँ कावेरी, पोंनैयार, पलार, वैगई और ताम्ब्रपर्णी आदि है| ये सभी नदियाँ अंतस्थर्लीय पहाड़ियों से पूर्व की ओर बहती हैं| कावेरी और उसकी सहायक नदियों से तमिलनाडू में जल की प्राप्ति होती है तथा इन नदियो के जल से विद्युत का उत्पादन किया जाता है। नदियों के डेल्टा की जलोढ़ मिटटी की प्रचुरता के साथ-साथ यहाँ की मुख्य मिट्टियों में चिकनी मिटटी, दोमट मिटटी, रेतीली मिटटी और लाल मिटटी पायी जाती है। कपास उत्पादक काली मिट्टी रेगुर के नाम से जानी जाती है और यह पश्चिम में सलेम एवं कोयम्बटूर, दक्षिण में रामनाथपुरम एवं तिरुनेलवली तथा मध्य में तिरुचिरापल्ली के कुछ हिस्सों में पायी जाती है|

तमिलनाडु की जलवायु और वनस्पति
    तमिलनाडू राज्य की जलवायु मुख्यतः उष्णकटिबंधीय है| ग्रीष्मकाल में तापमान यदा-कदा ही 43 डिग्री से ऊपर और शीत ऋतू में 18-24 डिग्री से नीचे जाता है| दिसंबर और जनवरी में न्यूनतम तथा अप्रैल और जून में अधिकतम तापमान रिकॉर्ड किया जाता है। औसत वार्षिक वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी और पूर्वोत्तर मानसून पर निर्भर है तथा यह मुख्यत: अक्टूबर से दिसम्बर के बीच और प्रतिवर्ष 635 मिमी से 1905 मिमी के बीच होती हैअधिकांश वर्षा नीलगिरी एवं अन्य पर्वतीय क्षेत्रो में और सबसे कम रामनाथपुरम तथा तिरुनेल्ल्व्ली जिलों में होती है| राज्य के लगभग 15 प्रतिशत हिस्से में वन है| पश्चिमी घाट के उच्चतम शिखरों वाले पर्वत नीलगिरी, अन्नामलाई और पालनी पहाड़ियां उपआल्पीय वनस्पतियों को सहारा देते हैं| पश्चिमी घाट के पूर्व की ओर तथा उत्तरी एवं मध्यवर्ती जिलो की पहाड़ियों की वनस्पतियों में सदाबहार एवं पर्णपाती वृक्षों के मिश्रित वन हैं जिनमें से कुछ शुष्क परिस्थितियों के काफी अनुकूल हैं| वनों से प्राप्त काष्ट उत्पाद में चदंन, पल्पवुड और बाँस शामिल हैं| यहाँ के वनों में रबर के वृक्ष बहुतायत से पाए जाते हैं| यहाँ के जलीय पक्षियों का प्रतिनिधित्व वेदांतनगल स्थित पक्षी अभ्यारण्य करता है जबकि अन्य वन्य प्राणियों को मुदामलाई स्थित आखेट अभयारण्य में देखा जा सकता है|
तमिलनाडू का जनजीवन और संस्कृति
    तमिलनाडु की अधिकतर जनसंख्या प्राचीन द्रविड़ जाति के वंशज है| ज्यादातर पर्वतीय जनजातियां दक्षिण-पूर्व एशियाई लोगों से साम्यता प्रदर्शित करती है| भारत के संविधान द्वारा भेदभाव वर्जित करने के बावजूद, तमिलनाडू में शेष भारत की तरह जाति व्यवस्था अभी भी मजबूती से कायम है। तमिलनाडू में प्रमुख रूप से तमिल भाषा बोली जाती है जो इस प्रदेश की राजकीय भाषा है| जनसंख्या का एक बड़ा भाग, जो काफी समय से इस राज्य में रह रहा है उसके लिए तमिल लगभग मातृभाषा बन चुकी है| जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा तेलुगु बोलता है जबकि कन्नड़, उर्दू और मलयालम अपेक्षाकृत कम लोगों द्वारा बोली जाती हैं| पश्चिम में नीलगिरी जिले में कन्नड़ और मलयालम अपेक्षाकृत ज्यादा प्रचलन में है| अंग्रेजी का उपयोग सहायक भाषा के रूप में होता है| राज्य में मुख्यत: हिन्दू, इसाई, इस्लाम और जैन धर्म के लोग हैं| पहले तीन धर्मों को मानने वाले लोग सभी जिलों में पाए जाते हैं लेकिन जैन धर्म उत्तरी और दक्षिणी ओर्कार्ट तथा चेन्नई तक सीमित है| जनसंख्या का अधिकांश भाग हिन्दू है। इसाइयो की सर्वाधिक उपस्थिति तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी जिलो में है| हाल ही में निरीश्वरवाद सम्भवत: ब्राह्मण कर्मकाण्ड के विरोध के रूप में विकसित हुआ है| तमिलनाडू भारत के सबसे ज्यादा शहरीकृत राज्यों में से एक होने के बावजूद भी यहाँ की ज्यादातर जनसंख्या ग्रामीण ही है| जनसंख्या  का अधिकांश हिस्सा 64 हजार से ज्यादा केंद्रीकृत गाँवों में रहता है| निर्धनतम निम्न जाति के लोग सेरी नामक पृथक क्षेत्रो में रहते हैं| औद्योगिक क्षेत्र , नगरीय क्षेत्र और चेन्नई के आसपास के गाँव चेन्नई महानगरीय विस्तृत शहरी क्षेत्र भी हैं जिनमे मदुरै , कोयम्बटूर और तिरुचिरापल्ली सर्वाधिक महत्वपूर्ण है| हिन्दू आबादी की निम्न जाति हरिजन की स्थिति अभी भी सोचनीय ही है यद्यपि हरिजन कल्याण विभाग उनकी शिक्षा, आर्थिक और घरेलू स्थिति को सुधारने के कार्यक्रमों की देखरेख करता हैराज्य के सरकारी पदों के आरक्षण के साथ-साथ विधानसभा और लोकसभा में भी उनके लिए सीटे आरक्षित है| यद्यपि इस राज्य में हिन्दू, इस्लाम, इसाई और जैन धर्म के मानने वाले व्यक्ति निवास करते हैं फिर भी यहाँ हिन्दू धर्म और संस्कृति की प्रधानता है| हिन्दू धार्मिक और सेवार्थ विभाग अपने अंतर्गत आने वाले 9300  से भी ज्यादा बड़े मन्दिरों पर प्रशासनिक नियन्त्रण रखता है| विशेषकर चिदम्बरम, कांचीपुरम, तंजावर, और मदुरै समेत अधिकाँश नगरों में गोरुपम छाए हुए हैं। मन्दिर उत्सव चक्र श्रधालुओ को आकर्षित करता है| उनमें सबसे प्रसिद्ध रथ उत्सव है जिसमें मूर्तियों से सुसज्जित रथों की शोभायात्रा के साथ मन्दिर के चारों ओर परिक्रमा कराई जाती है| हिन्दू परिवार विभिन्न मतों के प्रमुख संस्थानों या मठो से जुड़े हुए हैं| कुम्भकोणम का शंकरमठ सबसे महत्वपूर्ण है| तमिलनाडू का मुख्य नृत्य भरतनाट्यम तथा कर्नाटक संगीत काफी प्रसिद्ध है, यद्यपि चित्रकला एवं मूर्तिकला कम विकसित है फिर भी यहाँ पत्थर और कांसे की मूर्तियां बनाने की कला की शिक्षा के लिए विद्यालय है| तमिल साहित्य ने तेजी से लघुकथाओं एवं उपन्यासों के पश्चिमी साहित्यिक स्वरूप को अपनाया है| सुब्रह्मण्यम भारती पारम्परिक तमिल कविता को आधुनिक बनाने वाले प्रारम्भिक कवियों में से एक थे| सन् 1940 के दशक से चलचित्र जन मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम बना हुआ है| यहाँ चलते फिरते और स्थायी दोनों प्रकार के सिनेमाघर है| भावनात्मक और भव्य फिल्मों, जिनमें प्राय: हल्का-फुल्का संगीत और नृत्य होता है का निर्माण अधिकतर चेन्नई के आसपास स्टूडियो में होता है|

प्रस्तुति
प्रशांत कुमार दुबे
प्रबंधक (विधि)
एमएमटीसी लिमिटेड, क्षे.का. - चेन्नै